Bharat mata gramvasini subjective - भारतमाता ग्रामवासिनी
Bharat mata gramvasini subjective question - भारतमाता ग्रामवासिनी सब्जेक्टिव क्वेश्चन
इस लेख में Bharat mata gramvasini ka subjective question - भारतमाता ग्रामवासिनी सब्जेक्टिव क्वेश्चन दिया गया है।
अगर आप कक्षा - 10 ( Class 10th ) में है और बिहार बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले हैं तो इस लेख को ध्यानपूर्वक अवश्य पढ़ें।
क्योंकि इस लेख में कक्षा दसवीं हिंदी गोधूली भाग 2 के काव्यखण्ड पाठ - 2 Swadeshi ka subjective question - स्वदेशी का सब्जेक्टिव क्वेश्चन दिया गया है। जो आपके बोर्ड परीक्षा में पूछे जा सकते है तो अपने तैयारी को बेहतर बनाने के लिए नीचे दिए गए सभी प्रश्नों को अवश्य पढ़ें।
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| Bharat mata gramvasini subjective question answer |
Bihar board class 10th hindi subjective question 2023
उत्तर: कविता के प्रथम अनुच्छेद मे कवि भारतमाता का चित्र ग्रामवासीनी के रूप मे प्रस्तुत करता है। इसमें भारतमाता का वर्ण खेत की हरितिमा की तरह श्यामल है।
2. भारतमाता अपनी ही घर मे प्रवासिनी क्यों बनी हुई है?
उत्तर: गरीबी, भुखमरी, यातना और गुलामी के कारण भारतमाला अपनी ही घर मे प्रवासीनी बनी हुई है।
उत्तर: कविता मे कवि भारतवासियों का चित्र खीचते हुए कहते है कि- "भारतवासियों के तन पर कपड़े नहीं है। उनको भरपेट भोजन नहीं मिलता है। वे भूखे है, शोषित अज्ञानी, अशिक्षित और कंगाल है। वे नग्न, अर्थ क्षुधित, मूढ, असभ्य और दीन-हीन है।"
उत्तर: भारतमाता का वैभव, स्वर्णिम फसल विदेशियों के पैरों तले रौंदा जाने के कारण उसकी खुशियां एवं उसकी हंसी को अंग्रेजी दासता के राहु से ग्रस लिया है
उत्तर: भारतवर्ष ने कभी सम्पूर्ण विश्व को गीता के ज्ञान से आलोकित किया था लेकिन अंग्रेजी पराधीनता के कारण इसके सुख, वैभव, संस्कृति ज्ञान सब मे ग्रहण लग गया है। यह दीन-हीन अवस्था को प्राप्त हो चुका है। इसलिए कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर नही ज्ञानमूढ़ कहता है।
उत्तर: भारत ने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए स्वतंत्रता पाई। भारतमाता के द्वारा अहिंसा रुपी दूध पिलाने के कारण ही यह तप सफल हो पाया है। इसलिए कवि की दुष्टि मे भारतमाता का तस संयम सफल हो रहा है।
(क) चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाध्याच्छादित’
उत्तर: प्रस्तुत पंक्तियां हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तिका गोधूली, भाग - 2 के कविता ‘भारतमाता’ से लिया गया है। जिसके लेखक सुमित्रानंदन पंत जी है।
इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने भारत के मानवीकरण करते हुए पराधीनता से प्रभावित भारतमाता के उदासीन, दु:खी एवं चिंतित रूप को दर्शाया है।
प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने चित्रित किया है कि गुलामी में जकड़ी भारतमाता चिंतित है, उनकी भृकुटि से चिंता प्रकट हो रही है, क्षितिज पर गुलामीरूपी अंधकार की छाया पड़ रही है, माता की आँखें अश्रुपूर्ण हैं, और आँसू वाष्प बनकर आकाश को आच्छादित कर लिया है । इसके माध्यम से परतंत्रता की दु:खद स्थिति का दर्शन कराया गया है ।
(ख) ‘स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित’उत्तर: प्रस्तुत पंक्तियां हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तिका गोधूली, भाग - 2 के कविता ‘भारतमाता’ से लिया गया है। जिसके लेखक सुमित्रानंदन पंत जी है। इसमें कवि ने गुलाम भारत का सचीत्र चित्रण किया है।
प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने कहा है कि भारत पर अंग्रेजी हुकूमत कायम हो गयी है। यहाँ के लोग अपने ही घर में अधिकारविहीन हो गये हैं। पराधीनता के चलते यहाँ की प्राकृतिक शोभा भी उदासीन प्रतीत हो रही है । ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ कवि की स्वर्णिम फसल पैरों तले रौंद दी गयी है और भारतमाता का मन सहनशील बनकर कुंठित हो रही है। इसमें कवि ने पराधीन भारत की कल्पना को मूर्तरूप दिया है।

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